सारांश: SSD से कोई फ़ाइल डिलीट करने का मतलब यह नहीं है कि वह तुरंत रिकवर नहीं हो सकती। रिकवरी संभव होगी या नहीं, यह सिर्फ फाइल डिलीट करने पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उसके बाद SSD का कंट्रोलर क्या करता है, इस पर निर्भर करता है। TRIM और गार्बेज कलेक्शन जैसी प्रक्रियाएं यूजर के किसी एक्शन के बिना बैकग्राउंड में चलती रहती हैं और उन ब्लॉक्स को धीरे-धीरे क्लियर करती हैं जिनका अब इस्तेमाल नहीं हो रहा है। रिकवरी के समय तक यह बैकग्राउंड प्रोसेस कितना आगे बढ़ चुका है, इसी से तय होता है कि कितना डेटा अभी भी एक्सेस किया जा सकता है और कितना स्थायी रूप से इरेज़ हो चुका है। यही वजह है कि देखने में एक जैसी लगने वाली दो डेटा लॉस स्थितियों में रिकवरी का परिणाम अलग हो सकता है। यह आर्टिकल बताता है कि यह प्रक्रिया कैसे काम करती है और डेटा रिकवरी शुरू करने से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
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डिलीट की गई फाइल हमेशा उस तरह गायब नहीं होती, जैसा आमतौर पर माना जाता है। हार्ड ड्राइव में डेटा प्लैटर पर उसी जगह रहता है, जब तक उसके ऊपर कोई नया डेटा सेव नहीं हो जाता। इसलिए, अगर नया डेटा सेव होने से पहले कार्रवाई की जाए, तो डिलीट हुआ डेटा वापस पाने की संभावना रहती है।
सॉलिड-स्टेट ड्राइव में स्थिति काफी अलग होती है। एक जैसी डिलीट की गई फाइल रखने वाली दो SSD कुछ ही मिनटों में बिल्कुल अलग स्थिति में पहुंच सकती हैं। इसकी वजह यह है कि SSD कंट्रोलर आइडल टाइम में अपने आप कई मेंटेनेंस प्रोसेस चलाते हैं, जिनमें TRIM प्रोसेसिंग और गार्बेज कलेक्शन शामिल हैं। ये प्रोसेस यूजर को कुछ पता चलने से पहले ही डिलीट की गई फाइल के NAND ब्लॉक्स को क्लियर करने में मदद कर सकती है। इसकी वजह ड्राइव के अंदर मौजूद वह कंपोनेंट है जो यूजर के किसी एक्शन के बिना अपने रूटीन के अनुसार ये प्रोसेस चलाता रहता है।
SSD कंट्रोलर क्या है?
SSD कंट्रोलर ड्राइव के अंदर मौजूद एक प्रोसेसर है, जो ड्राइव पर होने वाले लगभग हर ऑपरेशन को संभालता है। इसमें होस्ट कंप्यूटर और NAND फ्लैश मेमोरी सेल्स के बीच कम्युनिकेशन भी शामिल है। ऑपरेटिंग सिस्टम का NAND चिप्स से सीधा कनेक्शन नहीं होता। डेटा को पढ़ने, लिखने, या डिलीट करने से जुड़े सभी निर्देश पहले कंट्रोलर तक पहुंचते हैं और फिर कंट्रोलर ही स्टोरेज पर इन कामों को पूरा करता है।
यह कम्युनिकेशन Flash Translation Layer (FTL) के माध्यम से होता है। FTL एक फर्मवेयर लेयर है, जिसमें कंट्रोलर ऑपरेटिंग सिस्टम द्वारा समझे जाने वाले लॉजिकल ब्लॉक एड्रेस और SSD की फ्लैश मेमोरी में मौजूद फिजिकल NAND लोकेशन के बीच मैपिंग रखता है। इसे लॉजिकल-टू-फिजिकल मैपिंग (L2P) कहा जाता है।
FTL को मैनेज करना कंट्रोलर के मुख्य कामों में से एक है। इसके अलावा, कंट्रोलर ड्राइव की एंड्योरेंस और डेटा रिलायबिलिटी को भी मैनेज करता है। डेटा रिकवरी में इसका सबसे महत्वपूर्ण काम यह तय करना है कि डिलीट किया गया डेटा फ्लैश सेल्स से कितनी जल्दी फिजिकली मिटाया जाता है।
SSD में डेटा डिलीट करने की प्रक्रिया HDD से कैसे अलग है?
SSD और HDD में डेटा डिलीट होने की प्रक्रिया एक जैसी नहीं होती। इसकी वजह दोनों स्टोरेज मीडियम की फिजिकल बनावट और उनके कंट्रोलर द्वारा रीड और राइट ऑपरेशन को मैनेज करने का तरीका है।
मुख्य अंतर इस बात में है कि दोनों ड्राइव डेटा को कैसे राइट करती हैं। HDD में डेटा को उसी जगह पर ओवरराइट किया जा सकता है, जबकि SSD में नया डेटा लिखने से पहले पुराने डेटा वाले सेल्स को पहले इरेज़ करना पड़ता है। आर्किटेक्चर का यह अंतर डिलीट किए गए डेटा के व्यवहार और बाद में उसकी रिकवरी की संभावना पर सीधा असर डालता है।
इसे थोड़ा विस्तार से समझना जरूरी है।
Write-in-Place और Erase-before-Write
हार्ड डिस्क ड्राइव में नया डेटा सीधे मौजूदा डेटा के ऊपर लिखा जा सकता है। जब कोई फाइल डिलीट होती है, तो ऑपरेटिंग सिस्टम फाइल सिस्टम टेबल से उसकी एंट्री हटा देता है और उससे जुड़े सेक्टर्स को दोबारा इस्तेमाल के लिए मार्क कर देता है। पहले से मौजूद डेटा प्लैटर पर तब तक फिजिकली मौजूद रहता है, जब तक किसी नए राइट ऑपरेशन में उन्हीं सेक्टर्स के ऊपर डेटा नहीं लिखा जाता।
SSD में प्रक्रिया अलग होती है। नए डेटा को लिखने से पहले NAND फ्लैश सेल्स को पूरी तरह इरेज़ करना पड़ता है, जिसमें सभी बिट्स को 1 पर सेट किया जाता है। इसके बाद जरूरी बिट्स को 0 पर सेट करके नया डेटा लिखा जाता है। जब कंट्रोलर को किसी फाइल में बदलाव करना होता है, तो वह नया डेटा किसी खाली ब्लॉक में लिखता है और पुराने लोकेशन को इरेज़ करने के लिए मार्क कर देता है। पुराने डेटा पर सीधे नया डेटा लिखना संभव नहीं होता।
Erase-before-Write की इस प्रक्रिया के कारण SSD को राइट और इरेज़ ऑपरेशन को अलग-अलग लेवल पर मैनेज करना पड़ता है। इसका सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि कंट्रोलर स्टोरेज को कैसे मैनेज करता है और डिलीट किया गया डेटा ड्राइव पर किस तरह मौजूद रहता है।
NAND आर्किटेक्चर: पेजेस और ब्लॉक्स
SSD की NAND मेमोरी को मैनेज करने के लिए दो अलग-अलग यूनिट्स का इस्तेमाल होता है। पेज सबसे छोटी यूनिट होती है, जिसे पढ़ा या लिखा जा सकता है, और इसका साइज़ आमतौर पर 4 से 16 किलोबाइट के बीच होता है। जब भी होस्ट सिर्फ एक बाइट डेटा भी मांगता है, तो SSD कंट्रोलर को पूरा पेज ही पढ़ना या लिखना पड़ता है।
ब्लॉक सबसे छोटी यूनिट होती है, जिसे इरेज़ किया जा सकता है, और इसमें आमतौर पर 64 से लेकर कई सौ तक पेज होते हैं। कंट्रोलर किसी एक पेज को अलग से लिख सकता है, लेकिन उसे अलग से इरेज़ नहीं कर सकता। स्पेस वापस पाने के लिए पूरे ब्लॉक को ही इरेज़ करना पड़ता है। अगर किसी ब्लॉक में वैलिड डेटा वाले पेज और डिलीट किए गए पेज दोनों मौजूद हों, तो कंट्रोलर को पहले वैलिड पेजों को किसी दूसरी खाली जगह पर शिफ्ट करना पड़ता है। इसके बाद ही ओरिजिनल ब्लॉक को इरेज़ किया जा सकता है।
पेज और ब्लॉक के बीच का यह अंतर एक आर्किटेक्चरल हकीकत है, जिसे हर SSD कंट्रोलर को मैनेज करना ही पड़ता है।
SSD में डेटा डिलीट होने की प्रक्रिया
SSD में डेटा डिलीट होने की प्रक्रिया तीन स्टेज में आगे बढ़ती है।
1. लॉजिकल डीऐलोकेशन: TRIM कमांड क्या करती है और क्या डिलीट नहीं करती
जब कोई यूजर फाइल डिलीट करता है, तो ऑपरेटिंग सिस्टम SSD कंट्रोलर को TRIM कमांड भेजता है। इसके बाद कंट्रोलर FTL मैपिंग में उस फाइल से जुड़ी पेजेस को इनवैलिड मार्क कर देता है।
इस स्टेज पर डेटा फिजिकली इरेज़ नहीं होता। वह अभी भी NAND सेल्स में मौजूद रहता है, लेकिन लॉजिकल रूप से उस तक पहुंच नहीं रहती। इसके बाद आने वाली हर TRIM कमांड कंट्रोलर को उन Logical Block Addresses (LBAs) की अपडेटेड लिस्ट देती है, जिनका अब उपयोग नहीं हो रहा है।
नोट: TRIM कमांड संबंधित पेजेस को इनवैलिड मार्क करती है। यह उन पेजेस में मौजूद डेटा को डिलीट या बदल नहीं देती है।
2. गार्बेज कलेक्शन: डिलीट किए गए डेटा को स्थायी रूप से इरेज़ करने की तैयारी
SSD कंट्रोलर ‘गार्बेज कलेक्शन’ नाम का एक ऑटोमैटिक प्रोसेस चलाता है। इसका काम उन NAND मेमोरी ब्लॉक्स से स्पेस खाली करना है, जिनमें कई इनवैलिड पेजेस मौजूद हैं।
इस प्रोसेस के दौरान कंट्रोलर ऐसे ब्लॉक की पहचान करता है, जिसे क्लीन करने की जरूरत है। उसमें मौजूद वैध पेजों को पहले किसी क्लीन ब्लॉक में माइग्रेट किया जाता है। इसके बाद पुराने ब्लॉक को इरेज़ करने के लिए कतार में डाल दिया जाता है।
आमतौर पर कंट्रोलर यह काम तब करता है जब SSD आइडल होती है, यानी उस समय जब ड्राइव पर यूजर की तरफ से ज्यादा एक्टिविटी नहीं हो रही होती।
3. फिजिकल NAND इरेज़: NAND फ्लैश मेमोरी से डेटा का परमानेंट डिलीशन
SSD कंट्रोलर Fowler-Nordheim tunnelling के जरिए ब्लॉक पर 15 से 20 वोल्ट का हाई-वोल्टेज पल्स लागू करता है। यह पल्स फ्लैश मेमोरी सेल्स में फंसे इलेक्ट्रॉन्स को बाहर निकालता है और ब्लॉक के हर बिट को लॉजिकल 1 पर रीसेट कर देता है। यह स्टेज पूरा होने के बाद डेटा स्थायी रूप से इरेज़ हो जाता है।
यह तीन-स्टेज प्रोसेस बताता है कि SSD से डिलीट किए गए डेटा की रिकवरी का नतीजा पहले से तय करना मुश्किल क्यों होता है। पेज डीऐलोकेशन और फिजिकल ब्लॉक इरेज़ के बीच का समय ही वह विंडो होती है, जिसमें डेटा रिकवरी अभी भी संभव हो सकती है।
SSD कंट्रोलर ड्राइव के ऑपरेशन और रिज़िलिएंस को कैसे प्रभावित करता है?
डेटा को स्टोर करना और डिलीट करना कंट्रोलर के काम का सिर्फ एक हिस्सा है। यह ड्राइव को सही तरीके से चलाता है, स्टोर किए गए डेटा को सुरक्षित रखता है और मेमोरी सेल्स के घिसने की प्रक्रिया को भी संभालता है। इस सेक्शन में इसी घिसने की प्रक्रिया पर ध्यान दिया गया है।
1. स्टोरेज को मैनेज करना
SSD में रीड और राइट ऑपरेशन पेज लेवल पर होते हैं, जबकि इरेज़ ऑपरेशन ब्लॉक लेवल पर होता है। इस सीमा के बावजूद स्टोरेज को बेहतर तरीके से मैनेज करने के लिए कंट्रोलर कई पैरेलल चैनल्स और Logical Units (LUNs) के साथ काम करता है। इसे पैरेललिज्म कहा जाता है।
कंट्रोलर इन LUNs के बीच ऑपरेशन बांटता है। एक चिप पर लंबा राइट या इरेज़ ऑपरेशन चल रहा हो, तो इसी दौरान दूसरी चिप पर नया कमांड शुरू किया जा सकता है। इस तरीके को इंटरलीविंग कहा जाता है।
कंट्रोलर छोटे और अलग-अलग जगहों पर होने वाले राइट ऑपरेशन को भी एक साथ जोड़कर बड़े, लगातार NAND पेज राइट्स में बदलता है। इससे हर छोटे राइट को अलग-अलग करने की जरूरत कम होती है और NAND सेल्स पर पड़ने वाला अनावश्यक वियर भी कम होता है। इस प्रोसेस को ‘राइट कोएलिसिंग’ कहा जाता है।
2. डेटा इंटीग्रिटी को बनाए रखना
SSD कंट्रोलर दो मुख्य तरीकों से लगातार डेटा की इंटीग्रिटी बनाए रखता है।
पहला तरीका एरर करेक्शन है। NAND सेल्स समय के साथ पुराने होने लगते हैं, जिससे उनमें बिट एरर्स आने लगते हैं। हर प्रोग्राम/इरेज़ साइकल के साथ इन एरर्स की संख्या बढ़ सकती है। इन्हें ठीक करने के लिए कंट्रोलर एरर करेक्शन कोडिंग (ECC) इंजन का इस्तेमाल करता है। ये इंजन लो-डेंसिटी पैरिटी-चेक (LDPC) और बोस-चौधरी-हॉकवेंगम (BCH) जैसे एल्गोरिदम पर आधारित होते हैं। हर रीड ऑपरेशन के दौरान ये इंजन बदले हुए बिट्स को पहचानते हैं और उन्हें ठीक करते हैं, ताकि ऑपरेटिंग सिस्टम को वही डेटा मिले जो मूल रूप से राइट किया गया था।
दूसरा तरीका पावर लॉस प्रोटेक्शन (PLP) है। एंटरप्राइज़ SSD में कंट्रोलर के साथ कैपेसिटर लगे होते हैं, जो थोड़ी देर के लिए पावर का बैकअप देते हैं। अगर ड्राइव की पावर अचानक चली जाए, तो ये कैपेसिटर कंट्रोलर को इतना समय देते हैं कि वह वॉलेटाइल बफर्स में मौजूद डेटा को NAND में राइट कर सके।
3. लाइफस्पैन बढ़ाना
NAND सेल्स की एक सीमित ऑपरेशनल लाइफस्पैन होती है। हर सेल को सीमित संख्या में ही प्रोग्राम और इरेज़ किया जा सकता है। इस सीमा को Program/Erase (P/E) Cycles में मापा जाता है। SSD की लाइफस्पैन बढ़ाने के लिए कंट्रोलर दो तरीकों से अलग-अलग सेल्स पर पड़ने वाले वियर को मैनेज करता है।
पहला तरीका डायनेमिक वियर लेवलिंग है। इसमें कंट्रोलर नए डेटा को उन ब्लॉक्स में राइट करता है, जिनमें अब तक सबसे कम P/E Cycles हुए हैं। दूसरा तरीका स्टैटिक वियर लेवलिंग है। इसमें कंट्रोलर उन ब्लॉक्स से कम बदले जाने वाले डेटा को दूसरी लोकेशन पर माइग्रेट करता है, जिन पर वियर कम है। इससे इन ब्लॉक्स को दोबारा एक्टिव इस्तेमाल में लाया जा सकता है। ऐसा न होने पर जिन ब्लॉक्स में स्टैटिक डेटा स्टोर है, वे लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं होंगे, जबकि दूसरे ब्लॉक्स जल्दी वियर आउट हो सकते हैं।
SSD कंट्रोलर ओवर-प्रोविजनिंग के जरिए भी ड्राइव की रिलायबिलिटी बेहतर करता है। मैन्युफैक्चरर्स ड्राइव की फिजिकल कैपेसिटी का कुछ हिस्सा रिजर्व रखते हैं, जो ऑपरेटिंग सिस्टम को दिखाई नहीं देता। कंट्रोलर इस रिजर्व स्पेस का इस्तेमाल गार्बेज कलेक्शन के लिए वर्कस्पेस के रूप में करता है। साथ ही, फेल हो चुके ब्लॉक्स की जगह लेने के लिए इसी रिजर्व से स्पेयर ब्लॉक्स भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
नोट: SSD डेटा रिकवरी में ओवर-प्रोविजनिंग एक और चुनौती जोड़ती है। डेटा फ्रैगमेंट्स फिजिकल मेमोरी में ऑपरेटिंग सिस्टम की एड्रेस रेंज के बाहर भी मौजूद हो सकते हैं। स्टैंडर्ड फाइल स्कैन ऐसे डेटा को चेक नहीं कर सकता, क्योंकि यह नॉर्मल लॉजिकल स्टोरेज के रूप में दिखाई नहीं देता। यही एक वजह है कि Stellar SSD डेटा रिकवरी एक्सपर्ट्स हर डिवाइस को सिर्फ फाइल सिस्टम के आउटपुट के आधार पर नहीं, बल्कि मीडिया और कंट्रोलर के बिहेवियर के लेवल पर भी जांचते हैं।
SSD कंट्रोलर के मुख्य प्रकार
SSD कंट्रोलर का आर्किटेक्चर एक-दूसरे से काफी अलग हो सकता है। इनमें मुख्य अंतर इस बात का होता है कि हर कंट्रोलर FTL मैपिंग टेबल को कहां स्टोर करता है और उसे कैसे एक्सेस करता है।
कंट्रोलर हर रीड और राइट ऑपरेशन के दौरान इस टेबल का इस्तेमाल करता है। इसलिए यह टेबल कहाँ मौजूद है, इसका सीधा असर ड्राइव की परफॉर्मेंस, कॉस्ट, और एंड्योरेंस पर पड़ता है। SSD कंट्रोलर के तीन मुख्य प्रकार DRAM-बेस्ड, DRAM-लेस, और HMB हैं। इनमें से हर एक FTL मैपिंग को मैनेज करने का अलग तरीका अपनाता है।
1. DRAM-बेस्ड कंट्रोलर
DRAM-बेस्ड कंट्रोलर में अपनी अलग मेमोरी चिप होती है, जिसमें FTL मैपिंग टेबल स्टोर रहती है। यह चिप कंट्रोलर के अंदर इंटीग्रेटेड हो सकती है या ड्राइव के प्रिंटेड सर्किट बोर्ड पर अलग से लगी हो सकती है।
DRAM, NAND की तुलना में लगभग 100 गुना तेज होती है। इसलिए कंट्रोलर एड्रेस लुकअप बहुत कम देरी के साथ कर सकता है। यही इन ड्राइव्स की तेज स्पीड का एक मुख्य कारण है।
इसका असर कॉस्ट और पावर कंजम्पशन पर पड़ता है। DRAM चिप ड्राइव की कीमत बढ़ाती है और दूसरे कंट्रोलर डिजाइन की तुलना में ज्यादा पावर लेती है। एक और समस्या इसकी वॉलेटिलिटी है। DRAM वॉलेटाइल होती है, इसलिए पावर कट होते ही इसमें मौजूद डेटा खो जाता है। इस तरह की हाई-एंड ड्राइव्स में इसे संभालने के लिए ऑनबोर्ड कैपेसिटर लगाए जाते हैं। ये कैपेसिटर इतनी देर तक पावर देते हैं कि ड्राइव पूरी तरह बंद होने से पहले कंट्रोलर मैपिंग टेबल को NAND में राइट कर सके।
2. DRAM-लेस कंट्रोलर
DRAM-लेस कंट्रोलर में अलग मेमोरी चिप नहीं होती। इससे ड्राइव की कीमत कम रहती है, साइज छोटा होता है, और यह कम पावर कंज्यूम करती है।
इसके बजाय, कंट्रोलर FTL टेबल को सीधे NAND में स्टोर करता है। हाल ही में इस्तेमाल की गई मैपिंग एंट्रीज को कंट्रोलर के अंदर मौजूद थोड़ी सी स्टैटिक रैंडम-एक्सेस मेमोरी (SRAM) में कैश किया जाता है। अगर जरूरी मैपिंग एंट्री इस छोटे SRAM कैश में मौजूद नहीं है, तो कंट्रोलर को मांगा गया डेटा रीड करने से पहले उसे NAND से फेच करना पड़ता है।
यह अतिरिक्त स्टेप लेटेंसी बढ़ाता है और SSD की रैंडम रीड और राइट परफॉर्मेंस को कम कर सकता है। इसके बदले, DRAM-लेस कंट्रोलर वाली SSD की कीमत कम होती है, इसका साइज छोटा होता है और यह DRAM-बेस्ड कंट्रोलर वाली SSD की तुलना में कम पावर कंज्यूम करती है।
नोट: अगर SSD को उसके कंट्रोलर आर्किटेक्चर के आधार पर चुना जा रहा है, तो DRAM-बेस्ड और DRAM-लेस ड्राइव के बीच चुनाव आमतौर पर इस बात पर निर्भर करता है कि कम कीमत के बदले परफॉर्मेंस में होने वाली कमी स्वीकार की जा सकती है या नहीं।
3. HMB (Host Memory Buffer) कंट्रोलर
होस्ट मेमोरी बफर (HMB) कंट्रोलर एक DRAM-लेस डिजाइन है, जो नॉन-वोलेटाइल मेमोरी एक्सप्रेस (NVMe) इंटरफेस का इस्तेमाल करने वाली ड्राइव्स में मिलता है। यह DRAM-बेस्ड और सामान्य DRAM-लेस कंट्रोलर के बीच का एक विकल्प है।
सिर्फ SRAM पर निर्भर रहने के बजाय, यह कंट्रोलर होस्ट सिस्टम की RAM का एक छोटा हिस्सा इस्तेमाल करता है। इससे FTL मैपिंग टेबल का बड़ा हिस्सा कैश किया जा सकता है, जो आमतौर पर 64 से 100 मेगाबाइट के बीच होता है।
HMB ड्राइव ज्यादातर वर्कलोड में DRAM-बेस्ड ड्राइव जैसी परफॉर्मेंस दे सकती है और इसकी कीमत भी काफी कम होती है। हालांकि, इसके लिए होस्ट सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ता है। अगर ऑपरेटिंग सिस्टम HMB को सपोर्ट नहीं करता या मेमोरी अलोकेशन की रिक्वेस्ट को स्वीकार नहीं करता, तो ड्राइव सामान्य DRAM-लेस कंट्रोलर की तरह काम करती है और HMB से मिलने वाला परफॉर्मेंस लाभ नहीं मिलता।
इन आर्किटेक्चरल अंतर का असर सिर्फ परफॉर्मेंस तक सीमित नहीं है। डेटा रिकवरी के मामले में कंट्रोलर का प्रकार यह तय करने में भूमिका निभाता है कि कौन से डायग्नोस्टिक तरीके इस्तेमाल किए जा सकते हैं, कौन से टूल काम आएंगे, और डिलीट किए गए डेटा का कितना हिस्सा अभी भी रिकवर किया जा सकता है।
निष्कर्ष: SSD डेटा रिकवरी की शुरुआत कंट्रोलर से होती है
इस गाइड में बताई गई हर बात आखिरकार एक ही कंपोनेंट से जुड़ती है। TRIM कमांड कंट्रोलर को बताती है कि कौन सा डेटा अब इस्तेमाल नहीं हो रहा है। गार्बेज कलेक्शन कंट्रोलर की निगरानी में चलता है। वियर लेवलिंग, ओवर-प्रोविजनिंग, और फिजिकल NAND इरेज़ जैसे प्रोसेस से जुड़े फैसले भी कंट्रोलर ही लेता है। इनमें से कई प्रोसेस कंट्रोलर अपने आप चलाता है, अक्सर उस समय भी जब ड्राइव आइडल होती है।
जब तक यूजर को यह पता चलता है कि डेटा खो गया है, तब तक हो सकता है कि कंट्रोलर रिकवरी की विंडो पहले ही बंद कर चुका हो। ऐसा हुआ है या नहीं, यह कंट्रोलर की आर्किटेक्चर, ड्राइव के वर्कलोड, और कितना समय बीत चुका है, इन सभी बातों पर निर्भर करता है।
इसी वजह से Stellar डेटा रिकवरी एक्सपर्ट्स हर SSD डेटा रिकवरी केस की शुरुआत कंट्रोलर-लेवल असेसमेंट से करते हैं। कंट्रोलर का प्रकार, उसका मैन्युफैक्चरर, और फेलियर की स्थिति में उसका बिहेवियर यह तय करता है कि कौन सा डायग्नोस्टिक तरीका इस्तेमाल किया जा सकता है, कौन से टूल काम आएंगे और वास्तव में कितना डेटा रिकवर किया जा सकता है। सिर्फ फाइल सिस्टम स्कैन करना काफी नहीं है। कंट्रोलर-लेवल पर की गई विस्तृत जांच से ही पता चल सकता है कि वास्तव में कितना डेटा रिकवर किया जा सकता है।
इस गाइड का भाग 2 इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है। इसमें हर तरह के कंट्रोलर के लिए रिकवरी का तरीका और वे स्थितियां बताई गई हैं, जिनमें डेटा को अभी भी रिकवर किया जा सकता है।
SSD से डेटा खो गया है? हमें 1800-102-3232 पर कॉल करें।
ड्राइव को तुरंत बंद कर दें, क्योंकि यह जितनी देर एक्टिव रहेगी, कंट्रोलर उतना ही डेटा रिकवर होने की संभावना को कम करता जाएगा। Stellar के SSD डेटा रिकवरी एक्सपर्ट कंट्रोलर की स्थिति का आकलन करके आपको बताते हैं कि सबसे कारगर रिकवरी विकल्प कौन से हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. अगर गलती से डेटा डिलीट हो जाए, तो क्या SSD को बंद कर देना चाहिए?
हां, और तुरंत। डेटा लॉस के बाद होने वाला हर ऑपरेशन कंट्रोलर को उस डेटा को स्थायी रूप से इरेज़ करने का एक और मौका देता है, जिसे रिकवर करने की कोशिश की जा रही है। सिस्टम अपडेट, ब्राउजर कैश, और बैकग्राउंड राइट्स, ये सभी कंट्रोलर की एक्टिविटी को ट्रिगर कर सकते हैं। इनमें से हर प्रोसेस रिकवरी की विंडो को और छोटा कर सकता है। ड्राइव को पावर ऑफ कर दें और तब तक चालू न करें, जब तक वह किसी डेटा रिकवरी इंजीनियर के पास न पहुंच जाए।
2. डेटा लॉस के बाद TRIM कमांड को डिसेबल करने से क्या डेटा रिकवरी की गारंटी मिलती है?
नहीं। TRIM बंद करने से डेटा डिलीट होने का एक रास्ता जरूर बंद हो जाता है, लेकिन इससे कंट्रोलर का काम रुकता नहीं है। गार्बेज कलेक्शन, वियर लेवलिंग, फर्मवेयर रूटीन और एन्क्रिप्शन जैसे प्रोसेस TRIM के बिना भी अपने आप चलते रहते हैं। इनमें से कोई भी प्रोसेस उस डेटा को हमेशा के लिए मिटा सकता है, जिसे शायद रिकवर किया जा सकता था। TRIM बंद करने से थोड़ा समय जरूर मिल जाता है, लेकिन इससे प्रोसेस पूरी तरह रुकते नहीं हैं।
3. क्या एन्क्रिप्शन SSD डेटा रिकवरी को प्रभावित कर सकता है?
हां, और SSD रिकवरी केस में यह एक महत्वपूर्ण फैक्टर हो सकता है। अगर फुल-डिस्क एन्क्रिप्शन एक्टिव है और डिक्रिप्शन की उपलब्ध नहीं है, तो डेटा NAND में फिजिकली मौजूद होने के बावजूद पूरी तरह अनरीडेबल हो सकता है। यह सॉफ्टवेयर-बेस्ड एन्क्रिप्शन और हार्डवेयर-लेवल सेल्फ-एन्क्रिप्टिंग ड्राइव्स (SEDs) दोनों पर लागू होता है। फिजिकल डेटा रिकवरी और डिक्रिप्शन दो अलग-अलग समस्याएं हैं, और दोनों को अलग-अलग हल करना पड़ता है।
4. क्या SSD में इस्तेमाल होने वाली NAND का प्रकार (SLC, MLC, TLC, QLC) रिकवरी की संभावना को प्रभावित करता है?
आम तौर पर जितना माना जाता है, उससे कम। TRIM, गार्बेज कलेक्शन, और फिजिकल इरेज़ से जुड़ी डेटा डिलीशन प्रोसेस सभी NAND ग्रेड में लगभग एक जैसी रहती है। NAND का प्रकार जहां मायने रखता है, वह बिट एरर रेट और ओवरऑल एंड्योरेंस है। ये दोनों समय के साथ ड्राइव की स्थिति को प्रभावित करते हैं। डेटा रिकवरी के मामले में NAND ग्रेड की तुलना में कंट्रोलर की आर्किटेक्चर और उसका बिहेवियर कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
5. अगर मेरे पास बैकअप है, तो क्या मुझे SSD डेटा रिकवरी की जरूरत है?
अगर बैकअप अभी का और पूरा है, तो नहीं। उसका इस्तेमाल करें। स्टेलर के इंजीनियरों तक पहुंचने वाले ज्यादातर केस इसलिए आते हैं क्योंकि या तो बैकअप मौजूद ही नहीं था, या इतना पुराना था कि काम का नहीं रहा, या फिर बैकअप खुद ही फेल हो गया था। एक वर्किंग बैकअप ही SSD डेटा लॉस के खिलाफ भरोसेमंद सुरक्षा है, क्योंकि हार्ड ड्राइव के उलट, SSD में डेटा गायब होने का पता चलने से पहले ही रिकवरी की विंडो बंद हो सकती है।